दुनिया की 5 सबसे तेजी से उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं के एक समूह को ब्रिक्स (BRICS) नाम दिया गया है. इसमें ब्राजील (Brazil), रूस (Russia), भारत (India), चीन (China) और दक्षिण अफ्रीका (South Africa) शामिल हैं. सभी पांचों देशों के पहले अंग्रेजी एल्फाबेट को जोड़कर इस समूह को ब्रिक्स (BRICS) नाम दिया गया है.
हाल के वर्षों में मिस्र (Egypt), इथियोपिया (Ethiopia), ईरान (Iran) और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) जैसे नए देश भी इस ग्रुप में शामिल हो चुके हैं. वर्तमान में ब्रिक्स में कुल 11 देश शामिल हो चुके हैं. यह समूह दुनिया की लगभग 45% आबादी और वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद (GDP) के करीब 30% हिस्से का प्रतिनिधित्व करता है.
ब्रिक्स क्यों बना और इसका उद्देश्य क्या: ब्रिक्स की स्थापना के पीछे मुख्य रूप से आर्थिक और जीओपॉलीटिकल कारण थे. दरअसल, द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से वैश्विक वित्तीय प्रणालियों पर अमेरिका और यूरोपीय देशों का दबदबा रहा. विश्व बैंक (World Bank) और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) जैसी बड़ी संस्थाओं में पश्चिमी देशों का ही वर्चस्व था. विकासशील देशों को एक मजबूत मंच देने के लिए ब्रिक्स का गठन किया गया, ताकि वे अपनी आवाज उठा सकें.
व्यापार के लिए ब्रिक्स ने बनाया अपना बैंक: ब्रिक्स के सदस्य देशों के बीच व्यापार, निवेश और विकास को बढ़ावा देना भी इसके गठन का एक प्रमुख कारण था. सदस्य देशों के बीच व्यापार के लिए ब्रिक्स ने साल 2014 में अपना खुद का एक बैंक भी बनाया, जिसे न्यू डेवलपमेंट बैंक (NDB) नाम दिया गया. यह बैंक विकासशील देशों को लोन देता है. ब्रिक्स का एक मुख्य लक्ष्य अमेरिकी डॉलर पर वैश्विक निर्भरता को कम करना और आपसी व्यापार को स्थानीय मुद्राओं में बढ़ावा देना भी है.
दरअसल, शिखर सम्मेलन से पहले, अगस्त में ब्रिक्स देशों के वित्त मंत्रियों और केंद्रीय बैंकों के प्रतिनिधियों ने एक बैठक की, जिसमें फाइनेंशियल सपोर्ट, पेमेंट और सदस्य देशों के बीच कारोबार के लिए लोकल करेंसी के इस्तेमाल पर चर्चा की गई. जो सम्मेलन में क्रॉस-बॉर्डर पेमेंट सिस्टम को लेकर होने वाले बड़े फैसले की ओर इशारा करता है.
ब्रिक्स करेंसी के पक्ष में नहीं भारत: ब्रिक्स देशों ने डॉलर पर निर्भरता कम करने के लिए ब्रिक्स करेंसी लाने का सुझाव अपनी पिछली बैठकों में दिया था. चीन, रूस और ईरान ब्रिक्स करेंसी का समर्थन कर रहे हैं. लेकिन, भारत डालर को पूरी तरह हटाने वाले किसी प्रस्ताव के समर्थन में नहीं है. भारत का कहना है कि सदस्य देशों के बीच कारोबार स्थानीय मुद्राओं में हो, डिजिटल पेमेंट का प्रचलन बढ़े लेकिन एक अलग करेंसी नहीं होनी चाहिए.
भारत आपसी व्यापार को रुपए, युआन, रूबल, दिरहम जैसी राष्ट्रीय मुद्राओं में करने और क्रॉस-बॉर्डर पेमेंट को सस्ता व तेज बनाने पर जोर है. ब्रिक्स करेंसी पर भारत के समर्थन नहीं करने से अब सभी देशों के डिजिटल पेमेंट नेटवर्क को जोड़ने वाले पेमेंट सिस्टम ब्रिक्स पे पर गंभीर चर्चा हो रही है.
ब्रिक्स पे क्या है? ये कैसे काम करेगा:ब्रिक्स पे (BRICS Pay) एक डीसेंट्रलाइज्ड डिजिटल पेमेंट सिस्टम होगा, जिसे ब्रिक्स बिजनेस काउंसिल की ओर से डेवलप किया जा रहा है. इसका उद्देश्य ब्रिक्स सदस्य देशों के बीच अमेरिकी डॉलर (USD) और पश्चिमी प्रभुत्व वाले SWIFT नेटवर्क पर निर्भरता को कम करना है. ब्रिक्स पे से सदस्य देश एक-दूसरे के साथ अपनी लोकल करेंसी में आसानी से और सीधे व्यापार व लेनदेन कर सकेंगे.
यह भारत के UPI, ब्राजील के Pix, रूस के SPFS और चीन के CIPS जैसे घरेलू डिजिटल पेमेंट नेटवर्क को आपस में जोड़ने का काम करेगा. लोकल करेंसी में पेमेंट होने से डॉलर को बीच में लाने की जरूरत नहीं होगी. इससे मुद्रा बदलने यानी करेंसी कन्वर्जन का खर्च बचेगा और लेनदेन तुरंत हो जाएगा.
ब्रिक्स पे से भारत को क्या फायदा: भारत के लिए ब्रिक्स पे का काफी महत्व है. यदि चीन, रूस या ब्राजील भारत से सामान खरीदते हैं, तो वे सीधे अपनी मुद्रा में भुगतान कर सकेंगे, जो भारतीय व्यापारियों को रुपए में प्राप्त होगा. इसमें करेंसी कन्वर्जन का कोई खर्च नहीं होगा. साथ ही पेमेंट कुछ सेकंड में ही हो जाएगी. इसके साथ ही ब्रिक्स देशों में यात्रा करने वाले पर्यटकों को विदेशी मुद्रा या अंतरराष्ट्रीय क्रेडिट कार्ड के बिना सिर्फ QR कोड स्कैन करके भुगतान करने की सुविधा मिलेगी. ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में इस भुगतान प्रणाली के पायलट प्रोजेक्ट को लेकर बड़े फैसले की उम्मीद की जा रही है.
ब्रिक्स पे को लेकर क्या है भारत का रुख: ब्रिक्स पे के जरिए भारत का मुख्य ध्यान डॉलर को हटाने (De-dollarisation) पर केंद्रित होने के बजाय लेनदेन की लागत को कम करने और भुगतान की गति को तेज करने पर है. दरअसल, भारत व्यापार में लोकल करेंसी के इस्तेमाल को गति देना चाहता है. जबकि, रूस और चीन डॉलर पर अपनी निर्भरता पूरी तरह खत्म करने के लिए 'ब्रिक्स पे' (BRICS Pay) या ब्लॉकचेन-आधारित स्वतंत्र 'डिसेंट्रलाइज्ड क्रॉस बॉर्डर मैसेजिंग सिस्टम' (DCMS) का दबाव बना रहे हैं. हालांकि, भारत एक संतुलित और सुरक्षित सामान्य डिजिटल ढांचा बनाने का पक्षधर है.
इस बात को रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के गर्वनर संजय मल्होत्रा ने मुंबई के एक कार्यक्रम में भी कहा. उन्होंने कहा कि ब्रिक्स देशों का समूह अपने-अपने तेज पेमेंट सिस्टम और सेंट्रल बैंक की डिजिटल करेंसी के बीच संभावित जुड़ाव पर चर्चा कर रहा है. सीमा-पार पेमेंट हम सभी के लिए दिलचस्पी का विषय है, क्योंकि इसमें लागत कम करने की काफी गुंजाइश है. भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने प्रस्ताव भी दिया है कि सदस्य देश अपनी सेंट्रल बैंक डिजिटल करेंसी (CBDCs) को व्यापार और पर्यटन भुगतानों के लिए आपस में लिंक करें.
डी-डॉलरलाइजेशन Vs लेनदेन लागत कम करना: यूक्रेन युद्ध के बाद पश्चिमी प्रतिबंधों का सामना कर रहा रूस अमेरिकी डॉलर और SWIFT सिस्टम को पूरी तरह दरकिनार (Bypass) करना चाहता है. रूस ब्रिक्स पे को एक ऐसे हथियार के रूप में देखता है जिससे अमेरिकी वित्तीय वर्चस्व को तोड़ा जा सके. वहीं, भारत इस व्यवस्था को डॉलर के खिलाफ किसी राजनीतिक गठबंधन के रूप में नहीं देखता.
भारत का मुख्य उद्देश्य लेनदेन की लागत (Transaction Costs) को कम करना और व्यापार को तेज बनाना है. भारत डॉलर को पूरी तरह खत्म करने के बजाय उसके समानांतर एक वैकल्पिक, सुरक्षित और व्यावहारिक व्यवस्था चाहता है. दरअसल, रूस का अमेरिका के साथ सीधा टकराव है, इसलिए वह एक पूरी तरह स्वतंत्र और वैकल्पिक वित्तीय प्रणाली लागू करने का दबाव बना रहा है.
वहीं, भारत के अमेरिका और पश्चिमी देशों के साथ बेहद मजबूत रणनीतिक और व्यापारिक रिश्ते हैं. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ब्रिक्स देशों को डॉलर से दूर जाने पर 100% टैरिफ लगाने की चेतावनी भी दे चुके हैं. इसको देखते हुए भारत फूंक-फूंक कर कदम रख रहा है.
कब तक ब्रिक्स पे के लागू होने की उम्मीद: ब्रिक्स पे को लांच करने के लिए साल 2026 का ही लक्ष्य रखा गया है. मंजूरी मिलने के बाद इसे 3 फेस में लागू करने की योजना है. पहले चरण में ब्रिक्स पे को पर्यटन क्षेत्र के लिए पायलट प्रोजेक्ट के रूप में शुरू किया जाएगा. इसके तहत सदस्य ब्रिक्स देशों में आने वाले विदेशी पर्यटकों को स्थानीय रिटेल आउटलेट्स पर अपने घरेलू डिजिटल वॉलेट या QR कोड के जरिए आसानी से भुगतान करने की सुविधा मिलेगी.
इसके बाद दूसरे चरण में ब्रिक्स देशों के बीच द्विपक्षीय व्यापारिक भुगतानों के लिए इसे एक्टिव किया जाएगा. इसके बाद 2029-30 तक इसे पूर्ण रूप से विकसित करके लागू करने की योजना है. दरअसल, ब्रिक्स देशों के डिजिटल पेमेंट नेटवर्क को एक साथ जोड़ना एक जटिल प्रक्रिया है, जिसमें काफी समय लगने की संभावना है.
ब्रिक्स पे से रुपया कैसे मजबूत होगा: जब भारत किसी देश से व्यापार करता है, तो भुगतान के लिए रुपए को पहले अमेरिकी डॉलर में बदला जाता है. फिर डॉलर को सामने वाले देश की करेंसी में बदला जाता है. ब्रिक्स पे इस बीच की डॉलर कड़ी को हटाकर पेमेंट सीधे रुपए में करेगा. इससे रुपया मजबूत होगा. दरअसल, इसके जरिए भारत को विदेश से कच्चा तेल, गैस या अन्य सामान खरीदने के लिए डॉलर की जरूरत नहीं होगी. ऐसे में विदेशी मुद्रा बाजार (Forex Market) में डॉलर की मांग घटेगी. इससे रुपए पर दबाव कम होगा और डॉलर के मुकाबले वह मजबूत हो जाएगा.
क्या बढ़ेगा रुपए का ग्लोबल स्टेट्स: ब्रिक्स पे से ब्रिक्स के सदस्य देश आपसी व्यापार में सीधे भारतीय रुपए (INR) को स्वीकार कर सकेंगे. दुनिया में व्यापारिक लेन-देन के लिए रुपए का उपयोग बढ़ेगा तो वैश्विक वित्तीय प्रणाली में इसकी साख और स्वीकार्यता यानी ग्लोबल स्टे्टस बढ़ेगा. स्थानीय मुद्राओं में व्यापार होने से भारत का विदेशी मुद्रा भंडार बचेगा. इससे डॉलर रिजर्व का उपयोग भारत अपनी अर्थव्यवस्था को बाहरी आर्थिक झटकों से बचाने में कर सकेगा.
व्यापारिक लेन-देन में होगी अरबों की बचत: वर्तमान में एक देश से दूसरे देश को पेमेंट करने में बैंकों और व्यापारियों को दोहरी मुद्रा परिवर्तन फीस (Double Currency Conversion Fee) और वेस्टर्न मध्यस्थ बैंकों (Correspondent Banks) को भारी शुल्क देना पड़ता है. ब्रिक्स पे आने के बाद इन बिचौलियों का काम खत्म हो जाएगा. इससे भारतीय व्यापारियों की सालाना करीब 9 अरब डॉलर से अधिक की बचत हो सकती है. लागत कम होने से भारतीय उत्पादों को वैश्विक बाजार में अधिक मजबूत मिलेगी.
इंपोर्ट-एक्पोर्ट के संतुलन पर भी निर्भर करेगी रुपए की मजबूती-कमजोरी: ब्रिक्स पे आने के बाद भी रुपया मजबूत तभी होगा जब भारत का इंपोर्ट-एक्सपोर्ट संतुलन ठीक होगा. यदि भारत किसी देश से आयात (Import) ज्यादा करता है और निर्यात (Export) कम, तो उस देश के पास भारतीय रुपया बहुत अधिक मात्रा में जमा हो जाएगा. ऐसे में रुपया कमजोर होगा. इससे पहले रूस के साथ ऐसा हो चुका है. भारत का रूस के इंपोर्ट ज्यादा हुआ और एक्सपोर्ट कम, जिससे उसके पास भारतीय रुपया ज्यादा जमा हो गया. इस असंतुलन को सुधारने के लिए भारत लगातार काम कर रहा है.