BRICS NDB and India: नई दिल्ली में इस महीने की 12-13 तारीख को ब्रिक्स सम्मेलन होने जा रहा है. इसमें रूस और चीन के राष्ट्रपतियों के साथ कई अन्य शासनाध्यक्षों के शामिल होने की संभावना है.
दिल्ली में इस महीने की 12-13 तारीख को 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन का आयोजन हो रहा है. इस सम्मेलन में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन सहित तमाम सदस्य देशों के शासनाध्यक्ष शामिल होने वाले हैं. यह एक बहुत बड़ा आयोजन है. भारत ब्रिक्स का संस्थापक सदस्य है. इस संगठन की स्थापना में उसकी अहम भूमिका रही है. इस संस्था का मुख्य उद्देश्य विकासशील देशों को आर्थिक विकास के लिए बेहतर विकल्प देना और पश्चिमी, खासकर अमेरिकी वर्चस्व वाली अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं पर निर्भरता कम करना है. इस वक्त ब्रिक्स में 11 पूर्ण सदस्य हैं. इसके अलावा 10 साझेदार देश भी इससे जुड़े हैं. यानी यह समूह अब 21 देशों तक पहुंच चुका है. खैर, आज हम ब्रिक्स से जुड़ी एक संस्था न्यू डेवलपमेंट बैंक यानी एनडीबी की बात करना चाहते हैं. विश्व बैंक और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष की तरह यह भी विकास परियोजनाओं के लिए कर्ज देने वाली अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्था है. लेकिन इसका गठन विकासशील देशों की जरूरतों को ध्यान में रखकर किया गया है.
इस बैंक की स्थापना में भारत की अहम भूमिका रही है. इसके पहले अध्यक्ष भारतीय बैंकर केवी कामथ थे. उन्होंने 2015 से 2020 तक बैंक की कमान संभाली. एनडीबी का मुख्यालय चीन के शंघाई में है. भारत में इसका क्षेत्रीय कार्यालय गुजरात के गिफ्ट सिटी में है. आमतौर पर वैश्विक भू-राजनीतिक हालात, चीन और भारत के रिश्तों, सीमा विवाद और अमेरिकी वर्चस्व जैसे मुद्दों के बीच जानकार ब्रिक्स के भविष्य को लेकर सवाल उठाते हैं. भारत की भूमिका और ब्रिक्स की उपयोगिता पर भी बहस होती रहती है. लेकिन ब्रिक्स की ताकत को केवल शिखर सम्मेलन और नेताओं की बैठकों से नहीं समझा जा सकता. असली कहानी उसके पीछे खड़ी आर्थिक संस्थाओं की है. एनडीबी इसका सबसे बड़ा उदाहरण है.
क्योंकि यह बैंक अब सिर्फ ब्रिक्स देशों की बैठक में चर्चा का विषय नहीं है. यह जमीन पर परियोजनाओं के लिए पैसा लगा रहा है. भारत में ही इसके कर्ज से मेट्रो, रैपिड रेल, जलापूर्ति और स्वच्छ ऊर्जा जैसी परियोजनाएं आगे बढ़ी हैं. ऐसे में सवाल बड़ा है. आखिर एनडीबी आज कहां खड़ा है? भारत को इससे कितना फायदा हुआ? और क्या इसी तरह की संस्थाएं अमेरिकी वर्चस्व वाली वैश्विक वित्तीय व्यवस्था के लिए चुनौती बन रही हैं?
अभी क्या है एनडीबी की स्थिति?
एनडीबी लगातार अपना दायरा बढ़ा रहा है. जून 2026 तक बैंक के 10 आधिकारिक सदस्य देश हो चुके हैं. इसमें ब्रिक्स के पांच संस्थापक देश ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका शामिल हैं. इसके बाद बांग्लादेश और संयुक्त अरब अमीरात 2021 में बैंक से जुड़े. मिस्र 2023 में इसका सदस्य बना. अल्जीरिया 2025 में शामिल हुआ. जून 2026 में उज्बेकिस्तान बैंक का दसवां सदस्य बना. इसके अलावा ईरान भी बैंक में शामिल होने की प्रक्रिया पूरी करने की तैयारी में है. उरुग्वे और कोलंबिया को भी संभावित नए सदस्यों के तौर पर मंजूरी मिल चुकी है. यानी बैंक का विस्तार सिर्फ ब्रिक्स के मूल पांच देशों तक सीमित नहीं है. दूसरे विकासशील देश भी इसमें शामिल होना चाहते हैं.
कितना बड़ा हो चुका है एनडीबी?
एनडीबी ने अब तक बुनियादी ढांचे और सतत विकास से जुड़ी करीब 120 परियोजनाओं के लिए लगभग 39 अरब डॉलर की मंजूरी दी है. बैंक की अधिकृत पूंजी 100 अरब डॉलर है. यानी उसके पास आने वाले वर्षों में बड़े पैमाने पर परियोजनाओं को वित्त देने की क्षमता है. बैंक वैश्विक बाजार से भी पैसा जुटा रहा है. 2026 में उसने फरवरी में 2 अरब डॉलर का तीन साल का बॉन्ड जारी किया. इसके बाद जुलाई में 1.75 अरब डॉलर का तीन साल का बॉन्ड जारी किया गया. इससे एक बात साफ होती है. एनडीबी अब केवल पांच देशों के योगदान से चलने वाली छोटी संस्था नहीं है. वह अंतरराष्ट्रीय पूंजी बाजार में भी अपनी जगह बना चुका है.
एनडीबी में भारत की कितनी बड़ी भूमिका है?
भारत एनडीबी का केवल एक सदस्य नहीं है. वह इसके संस्थापक देशों में शामिल है. दरअसल, एनडीबी का विचार ही भारत ने 2012 में नई दिल्ली में हुए चौथे ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में सामने रखा था. इसके बाद 2014 में बैंक की स्थापना का समझौता हुआ और 2015 में इसने काम शुरू किया. शुरुआत में बैंक की 50 अरब डॉलर की सदस्यता वाली पूंजी में भारत की हिस्सेदारी 20 प्रतिशत थी. ब्राजील, रूस, चीन और दक्षिण अफ्रीका की भी इतनी ही हिस्सेदारी थी. यहां एक महत्वपूर्ण अंतर है. अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व बैंक जैसी संस्थाओं में मतदान व्यवस्था अक्सर आर्थिक हिस्सेदारी से जुड़ी होती है. एनडीबी के संस्थापक पांच देशों को बराबर मतदान अधिकार दिए गए हैं. यानी भारत के पास चीन के बराबर मतदान शक्ति है. किसी एक देश को अकेले वीटो अधिकार नहीं दिया गया है. बैंक के नियम यह भी सुनिश्चित करते हैं कि संस्थापक पांच देशों के पास कुल मतदान शक्ति का कम से कम 55 प्रतिशत हिस्सा बना रहे.
भारत को एनडीबी से कितना फायदा?
यहीं से इस बैंक की असली कहानी शुरू होती है. भारत एनडीबी के सबसे बड़े लाभार्थियों में शामिल है. बैंक ने भारत की करीब 32 बड़ी परियोजनाओं के लिए लगभग 9.5 अरब डॉलर की मंजूरी दी है. इनमें शहरी परिवहन, जलापूर्ति, ग्रामीण बुनियादी ढांचे और स्वच्छ ऊर्जा से जुड़ी परियोजनाएं शामिल हैं. यानी एनडीबी का पैसा केवल किसी सरकारी खाते में पड़ा नहीं है. वह ऐसी परियोजनाओं में लगा है जिन्हें आम भारतीय रोज अपनी आंखों से देख सकता है.
मुंबई से इंदौर तक मेट्रो में एनडीबी का पैसा
भारत में मेट्रो परियोजनाओं का विस्तार पिछले कुछ वर्षों में तेजी से हुआ है. एनडीबी ने इस क्षेत्र में भी बड़ी भूमिका निभाई है. मुंबई मेट्रो की परियोजनाओं को बैंक से वित्तीय मदद मिली है. चेन्नई और इंदौर की मेट्रो परियोजनाओं के विस्तार में भी एनडीबी का पैसा लगा है. इसके अलावा दिल्ली-गाजियाबाद-मेरठ रैपिड रेल को भी एनडीबी से वित्तीय सहायता मिली है. सोचिए. दिल्ली से मेरठ तक तेजी से सफर कराने वाली जिस रैपिड रेल की चर्चा देशभर में होती है, उसके पीछे भी ब्रिक्स के बैंक की वित्तीय भागीदारी है. यानी ब्रिक्स को लेकर होने वाली बहस का एक हिस्सा हमारे शहरों की जमीन पर भी दिखाई देता है. एनडीबी का निवेश केवल बड़े शहरों की परिवहन परियोजनाओं तक सीमित नहीं है. मणिपुर और हिमाचल प्रदेश में जलापूर्ति से जुड़ी बड़ी परियोजनाओं को भी बैंक ने वित्तीय मदद दी है. ग्रामीण रोजगार को बढ़ावा देने के लिए करीब 1 अरब डॉलर के कर्ज की व्यवस्था भी की गई है. इसके अलावा भारत में सौर और पवन ऊर्जा क्षमता बढ़ाने के लिए भी एनडीबी ने निवेश किया है.
अमेरिका को ब्रिक्स से परेशानी क्यों?
यही इस पूरी कहानी का सबसे महत्वपूर्ण सवाल है. ब्रिक्स का विस्तार अपने आप में अमेरिका के लिए चिंता का विषय हो सकता है. लेकिन उससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण है कि ब्रिक्स धीरे-धीरे अपनी संस्थागत ताकत बढ़ा रहा है. एनडीबी इसका उदाहरण है. दुनिया में विकास परियोजनाओं के लिए लंबे समय तक विश्व बैंक और दूसरी पश्चिमी वित्तीय संस्थाएं प्रमुख स्रोत रही हैं. एनडीबी विकासशील देशों को एक वैकल्पिक वित्तीय रास्ता देता है. यही बदलाव रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है. अगर भारत, चीन, रूस, ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका और दूसरे विकासशील देश अपनी जरूरतों के लिए पश्चिमी संस्थाओं के अलावा दूसरे विकल्प भी विकसित करते हैं, तो वैश्विक वित्तीय व्यवस्था में शक्ति का संतुलन बदल सकता है. हालांकि एनडीबी को अभी विश्व बैंक या अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष का सीधा विकल्प कहना जल्दबाजी होगी. उसका आकार और वैश्विक पहुंच अभी उन संस्थाओं से काफी छोटी है. लेकिन दिशा महत्वपूर्ण है.
भारत के लिए एनडीबी क्यों अहम है?
भारत को अगले कई दशकों तक भारी बुनियादी ढांचे की जरूरत होगी. शहरों में मेट्रो चाहिए. तेज सार्वजनिक परिवहन चाहिए. गांवों में पानी और रोजगार चाहिए. स्वच्छ ऊर्जा की क्षमता बढ़ानी है. इन सबके लिए बहुत बड़े निवेश की जरूरत होगी. ऐसे में भारत के पास जितने ज्यादा भरोसेमंद वित्तीय स्रोत होंगे, उतना ही फायदा होगा. एनडीबी भारत को यही अतिरिक्त विकल्प देता है. और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इसमें भारत संस्थापक सदस्य है. बैंक के संचालन और फैसलों में उसकी बराबर की भूमिका है. इसलिए एनडीबी को केवल ब्रिक्स का बैंक कहना शायद इसकी पूरी कहानी नहीं बताता. यह उस बदलती दुनिया का संकेत है जिसमें विकासशील देश अपनी वित्तीय संस्थाएं और अपने विकल्प खड़े करने की कोशिश कर रहे हैं.