आपने कई बार सुना होगा कि भारत-रूस के रिश्ते गाढ़े वक्त के साथ में बने हैं. ये यूं ही नहीं कहा जाता, जब भारत को सबसे ज्यादा जरूरत थी, तब तत्कालीन सोवियत संघ रहे रूस ने झट से उसका साथ दिया था. साउथ एशिया का इतिहास बदलने वाली इस घटना को न सिर्फ दुनिया की सबसे जबरदस्त कूटनीति के तौर पर याद किया जाता है, ये भारत-रूस रिश्ते में मील का पत्थर है.
रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन अगले हफ्ते भारत के दौरे पर आने वाले हैं. 23वीं रूस-भारत शिखर वार्ता के लिए पुतिन के दौरे को कूटनीतिक लिहाज से बहुत महत्वपूर्ण माना जा रहा है, खासतौर पर ऐसे वक्त में, जब रूस-अमेरिका के बीच यूक्रेन मसले का हल लगभग निकलने के करीब है. भारत और रूस अगर एक-दूसरे को सदाबहार दोस्त मानते हैं, तो इसके पीछे मित्रता का पूरा इतिहास है. हम आज इस दोस्ती की एक कहानी आपको सुनाएंगे, जो शुरू होती है साल 1971. वो साल…जिसने दक्षिण एशिया का नक्शा बदल दिया.
इस साल भारत को लगभग विश्वयुद्ध जैसे हालात में धकेल दिया था. यह वही कहानी है जिसने दुनिया को दिखा दिया कि भारत-रूस सिर्फ कागजों पर नहीं बल्कि ऐसे मौसम के दोस्त हैं, जब हवाएं विपरीत चल रही हों. यूक्रेन मसले को लेकर भले ही दुनियाभर के देश रूस को गलत ठहराएं, भारत इस मामले में तटस्थ ही रहा क्योंकि 1971 में जब अमेरिका और ब्रिटेन जैसे देश भारत के खिलाफ खड़े हो गए थे, तो रूस चट्टान बनकर भारत के साथ खड़ा था.
क्यों रूस-भारत की दोस्ती में अहम है साल 1971?
1971 की शुरुआत से ही पूर्वी पाकिस्तान (आज का बांग्लादेश) खूनी उथल-पुथल में डूब चुका था. पाकिस्तानी सेना और उसकी सेनाओं ने बंगाली जनता पर ऐसा कहर ढाया कि लाखों लोग अपने घर छोड़कर भारत की ओर भागने को मजबूर हो गए. भारत-पूर्वी पाकिस्तान की सीमाएं टूट गईं और भारत के पूर्वोत्तर राज्यों में शरणार्थियों का सैलाब उमड़ आया. भारतीय खुफिया एजेंसियों की रिपोर्ट साफ थीं- पूर्वी पाकिस्तान में इंसान मिट्टी की तरह कुचले जा रहे थे लेकिन तब दुनिया की महाशक्तियां मानी जाने वाले अमेरिका, ब्रिटेन और चीन चुप्पी लगाए बैठे थे. भारत इन हालात में अकेला पड़ गया था.
इंदिरा गांधी के किस दांव ने बदला इतिहास?
इंदिरा गांधी इस वक्त अच्छी तरह समझ चुकी थीं कि भारत अब बिना किसी वैश्विक सहारे के युद्ध में घिरने वाला है. पाकिस्तान का सैन्य नेतृत्व युद्ध की तैयारी कर चुका था और पाकिस्तान का सबसे बड़ा समर्थक बना अमेरिका उसके पीछे खड़ा था. इसी संकट में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने वह कदम उठाया जिसे आज भी दुनिया कूटनीति का मास्टरस्ट्रोक कहती है. अगस्त, 1971 में भारत और सोवियत संघ के बीच एक ऐसा रक्षा समझौता हुआ, जिसने युद्ध की तस्वीर बदल दी. ये थी – Indo-Soviet Treaty of Peace, Friendship and Cooperation, जिसमें साफ लिखा था कि यदि किसी भी देश पर बाहरी हमला हुआ, तो दोनों एक-दूसरे के साथ खड़े होंगे. यह समझौता सिर्फ कागज़ का टुकड़ा नहीं था बल्कि आने वाले तूफान में भारत के लिए ढाल बनने वाला था.
क्यों महाशक्तियों के बीच घिरा भारत?
इधर भारत-सोवियत समझौता हुआ, उधर पाकिस्तान ने युद्ध का बिगुल बजा दिया. दिसंबर, 1971 में पाकिस्तान ने भारत के पश्चिमी मोर्चे पर हमला कर दिया और इसके साथ ही भारत-पाक युद्ध आधिकारिक रूप से शुरू हो गया. यह सिर्फ भारत-पाक युद्ध नहीं था बल्कि ये दुनिया के दो बड़े खेमों की राजनीतिक परीक्षा थी. युद्ध शुरू होते ही अमेरिका ने पाकिस्तान का साथ खुलकर देना शुरू कर दिया. व्हाइट हाउस ने वियतनाम से विश्व के सबसे खतरनाक समुद्री युद्ध बेड़ों में से एक सातवां बेड़ा बंगाल की खाड़ी की ओर मोड़ दिया. यह बेड़ा किसी चलती-फिरती अटैकिंग मशीन से कम नहीं था, जिसमें 70 से ज़्यादा लड़ाकू विमान, मिसाइलें, परमाणु क्षमता वाली पनडुब्बियां मौजूद थीं. वहीं ब्रिटेन ने भी अरब सागर की ओर अपना समुद्री दस्ता भेज दिया. चीन भी हमला कर सकता था, ऐसे में भारत घिर गया था और समंदर में खतरा बढ़ गया था. स्थिति गंभीर से भी ज्यादा गंभीर हो गई थी.
निया के आगे भारत की ढाल बना दोस्त रूस
हालात की गंभीरता देखते हुए भारत के नेतृत्व ने एक आपात संदेश सोवियत राष्ट्रपति लियोनिड ब्रेझनेव को भेजा. संदेश में साफ लिखा था- अमेरिकी और ब्रिटिश युद्धपोत भारत की ओर बढ़ रहे हैं, स्थिति किसी भी क्षण नियंत्रण से बाहर जा सकती है. यही भारत-रूस रिश्ते की अग्निपरीक्षा थी, जहां रूस खरा उतरा. उस वक्त रूस के राष्ट्रपति थे लियोनिड ब्रेझनेव, जिसकी भूमिका आज भी भारत की कूटनीति में आदर से याद की जाती है. इंदिरा गांधी का संदेश मिलते ही ब्रेझनेव ने एक पल भी नहीं गंवाया. उन्होंने आदेश दिया- ‘सोवियत संघ की मिसाइलों से लैस पनडुब्बियां और नौसैनिक बेड़े तुरंत बंगाल की खाड़ी और अरब सागर की ओर बढ़ें. कुछ ही घंटे में सोवियत नौसैनिक ताकत समुद्र में उतर चुकी थी. अमेरिकी सातवां बेड़ा जैसे ही बंगाल की खाड़ी के करीब आया, उसे यह अहसास हुआ कि समुद्र में कोई अकेला नहीं है. सोवियत सबमरीनें अमेरिकी जहाजों के रास्ते में एक दीवार की तरह सीना ताने खड़ी थीं.
अमेरिकी कमांडर ने वाशिंगटन को आपात संदेश भेजा- ‘सोवियत नौसेना तैयार है, टकराव की स्थिति उत्पन्न हो सकती है’. उस दौर में दो महाशक्तियों के बीच गलतफहमी विश्व-युद्ध छेड़ सकती थी. ऐसे में वॉशिंगटन की ओर से आदेश आया- ‘पीछे हटो, तुरंत वापस लौटो.’ अमेरिका का बेड़ा मुड़ गया, ब्रिटेन की तैनाती रुक गई और चीन चुप ही रह गया. इस तरह भारत को दुनिया की तीन महाशक्तियों द्वारा किए जा रहे घेराव से बचाने वाला वह देश था-सोवियत संघ यानि रूस. दिलचस्प बात ये भी है कि सोवियत संघ का नेतृत्व कर रहा था -यूक्रेन में पैदा हुआ का एक नेता क्योंकि तब यूक्रेन सोवियत संघ से अलग नहीं था.